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कबीर (1398-1518)

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कबीर (1398-1518)   heylink.me ;;;  HeyLink.me | Rupaliyoutuber उत्तर- (1) सुखी व दुखी सांसारिक दृष्टि से संसार के सभी लोग मुखी और कबीर दास दुखी है। संसार के लोग भोग थाओं में मस्त हैं और इसी को सुख समझ रहे हैं, लेकिन कबीर लोगों को यह समझा रहे हैं, जबकि भोग पदार्थों का सुख क्षणिक है और प्रभु का सुख स्थायी है। (i) सोना व जागना – जिसको प्रभु का जान नहीं है, वह संसार के भोग पदार्थों में मस्त है, जो स्थान की तरह है। - इसलिए संसार की यह समझ ही सोना है। जो व्यक्ति प्रभु के जान से वास्तविक सुख को जान चुका है, एक-सा रहता है, वह जागा हुआ है। वास्तविक सुख को न जानना साना है और चारतविक सुख को जानना जागना है। प्रश्न 5. अपने स्वभाव को निर्मल रखने के लिए कबीर ने क्या उपाय सुझाया है? उत्तर- (i) कबीर का मत कबीर का कथन है कि अपनी निंदा करने वाले व्यक्ति को सदैव अपने पास रखना चाहिए। इससे बार-बार अपनी बुराई सुनने का अवसर मिलता है और हम बुराइयों को दूर करने का प्रयास करते हैं। ऐसा बार-बार होने से हमारी सभी बुराइयाँ मिट जाएँगी और हमारा स्वभाव निर्मल को आएगा। (ii) कबीर का सुझाव इसके लिए कचीर का सुझाव...

अंतोन चेखव (1860-1904)

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अंतोन चेखव  हाथ में बदला, पुलिस इंटर पहने हुए बाजार के ची में करियों की ताराला एक सिपाही चला आ रहा था। चारों किसी आदमी का शान तक नहीं था। दुकानों के खुदवाने की तरह की इस सृष्टिको उपासनाहों से ताक रहे थे। कोई तक उनके आस-पास नहीं दिख रहा था सहसा ओचुमेलीय के कानों में एक आवाज गूँगी" तू काटेगा तू होतान कहाँ का? आ छोकरो! इसे साए जाने इनदिनों काट मन है। इसको किसी कुठे के काने की आवारा सुनाई दोसको दिशा में और या कि एक व्यापारी पियूगिन के गम में से एक कुचा तो गा के बल पर जा रहा है की कफ़ लगी कमीज और बिना बटन को बास्केट पहने हुए एक का था। गिरते पड़ते उसने कृों को पिछली दो से पकड़ लिया। फिर कुछ का किया और एक चीज दी। दुकानों में हुए चेहरे बाहर शौक और देखते ही देखते जैसे जमीन फालिएको भंग हो जाने जैसा कुछ दीख रहा है, सिपाही दु मा। तभी एक जिसके अनुसार- इस हरामको आ उसी वक्त किसी कुत्ते के काने की आवास पर जब इंस्पेक्टर ने मुड़कर देखो एक चिि से एक तीन ओचुमेली मुद्दा और भीड़ को तरफ चल दिया। उसने टीएम के धारण किए हुए उस आदमी रहा था। उसके देखा, जो अपना उठाए वहाँ मौजूद था तथा उपस्थित लोगों को अपनी आप च...

अंतोन चेखव (1860-1904)

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                                                                अंतोन चेखव (1860-1904)  दक्षिणी रूस के नगनोर नगर में 1860 में जन्मे अंतोन चेखव ने शिक्षा काल में ही कहानियों लिखना शुरू कर दिया था। उन्नीसवीं सदी का दशक रूम के लिए एक मुश्किल समय था। यह वह समय था जब आसाद खयाल होने से ही लोग शासन के दमन का शिकार हो जाया करते थे। ऐसे समय में चेखव ने उन मौकापरस्त लोगों को बेनकाब करती कहानियां लिखीं जिनके लिए पैसा व पद ही सब कुछ था। चेखव सारे विश्व के चहेते लेखक माने जाते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि इनकी दृष्टि में सत्य ही सर्वोपरि रहा। सत्य के प्रति आस्था और निष्ठा, यही चेखव की धरोहर है। चेखव की मुख कहानियाँ हैं—गिरगिट, क्लक की मौत, वान्का, तितली, एक कलाकार की कहानी, बोंबा, इओनिज, रोमांस, दुलहन प्रसिद्ध नाटक हैं-वाल्या मामा, सीगल, तीन बहने और चेरी का बगीचा।

सीताराम सेकसरिया (1892-1982)

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सीताराम सेकसरिया (1892-1982)                                                                   डायरी का एक पन्ना 26 जनवरी आज का दिन तो अमर दिन है। आज के ही दिन मारे हिंदुस्तान में और इस वर्ष भी उसको पुनरावृत्ति थी जिसके लिए काफी तैयारियों पहले से की गई थीं। अपन वर्ष हिस्सा बहुत था। इस वर्ष अपने सकते थे दिया था। केवल प्रचार में दो हजार रुपया खर्च किया गया था कम अपने समझते थे अपने ऊपर है, और इसी तरह जो कार्यकर्ता थे उनके घर जाकर प्रायः मकानों पर राष्ट्रीय झंडा फहरा रहा था और कई मकान तो ऐसे सजाए गए थे कि ऐसक मिल गई हो। कलकत्ते के प्रत्येक भाग में ही झंडे लगाए गए थे। जिस रास्ते से मनुष्य जाते थे उसी रास्ते में और नवीनता मालूम होती थी। लोगों का कहना था कि ऐसी सजावट पहले नहीं हुई। पुलिस भी अपनी पूरी शहर में गश्त देकर प्रदर्शन कर रही थी। मोटर लारियों में गोरखे तथा सारजे प्रत्येक मोड़ पर थे। कितनी ही शहर में घुमाई जा रही थीं। घुड़सव...

सीताराम सेकसरिया (1892-1982)

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                                                        सीताराम सेकसरिया (1892-1982) राजस्थान के नवलगढ़ में 1892 में जन्मे सीताराम सेकसरिया का ज्यादातर जीवन कलब (कोलकाता) में बोता। व्यापार-व्यवसाय से जुड़े सेकसरिया कई साहित्यिक, सांस्कृतिक और नारी शिक्ष संस्थाओं के प्रेरक, संस्थापक, संचालक रहे। महात्मा गांधी के आह्वान पर स्वतंत्रता आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया। गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर, महात्मा गांधी, नेताजी सुभाषचंद्र बोस के करीबी रहे। सत्याग्रह के दौरान जेल यात्रा भी की। कुछ साल तक आजाद हिंद फौज के मंत्री भी रहे। भारत सरकार ने उन्हें 1962 में पद्मश्री पुरस्कार से अलंकृत किया। सीताराम सेकसरिया को विद्यालयी शिक्षा पाने का मौका नहीं मिला। स्वाध्याय से हो पढ़ना-लिखन सौखा। स्मृतिकण, मन की बात, बीता युग, नयी याद तथा दो भागों में एक कार्यकर्ता की डायरी उनको उल्लेखनीय कृतियाँ हैं।

प्रेमचंद (1880-1936)

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प्रेमचंद (1880-1936)   एक जमाना था कि लोग आठवाँ दरजा पास करके नायब तहसीलदार हो जाते थे। मैं कितने ही मिडिलचियों को जानता हूँ, जो आज अव्वल दरजे के डिप्टी मैजिस्ट्रेट या सुपरिटेंडेंट हैं। कितने हो आठवीं जमात वाले हमारे लीडर और समाचारपत्रों के संपादक हैं। बड़े-बड़े विद्वान उनकी मातहती में काम करते हैं और तुम उसी आठवें दरजे में आकर बाजारी लौंडों के साथ कनकौए के लिए दौड़ रहे हो। मुझे तुम्हारी इस कम अक्ली पर दुःख होता है तुम जहीन हो, इसमें शक नहीं, लेकिन वह जेहन किस काम का जो हमारे आत्मगौरव की हत्या कर डाले। तुम अपने दिल में समझते होंगे, में भाई साहब से महज एक दरजा नीचे हूँ और अब उन्हें मुझको कुछ कहने का हक नहीं है, लेकिन यह तुम्हारी गलती है। मैं तुमसे पाँच साल बड़ा हूँ और चाहे आज तुम मेरी ही जमात में आ जाओ और परीक्षकों का यही हाल है, तो निस्संदेह अगले साल तुम मेरे समकक्ष हो जाओगे और शायद एक साल बाद मुझसे आगे भी निकल जाओ, लेकिन मुझमें और तुममें जो पाँच साल का अंतर है, उसे तुम क्या, खुदा भी नहीं मिटा सकता। मैं तुमसे पाँच साल बड़ा हूँ और हमेशा रहूँगा मुझे दुनिया का और जिंदगी का जो तजुरबा ह...

प्रेमचंद (1880-1936)

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   प्रेमचंद (1880-1936)          बनारस के करीब लमही गाँव में 31 जुलाई 1880 को जन्मे धनपत राय ने उर्दू में गुलाब राय और हिंदी में प्रेमचंद नाम से लेखन कार्य किया। निजी व्यवहार तथा चार धनपत राय नाम से ही करते रहे। उर्दू में प्रकाशित पहला कहानी संग्रह ''अंग्रेज सरकार ने जब्त कर लिया। आवधिका के लिए स्कूल मास्टरी इंस्पेक्टरी मैनेज करने के अतिरिक्त इन्होंने 'हंस 'माधुरी' जैसी प्रमुख पत्रिकाओं का संपादन भी किया। कुछ समय बबई (मुंबई) की फिल्म नगरी में भी बिताया परंतु यह उन्हें रास नहीं आई। हालांकि उनको कई कृतियों पर यादगार फिल्में बनी सामान्य आदमी के दुख-दर्द के बेजोड़ चिंतर प्रेमचंद को उनके जीवन काल में ही कथा सम्राट उपन्यास सम्राट आदि उपाधियों से जाना जाने लगा था। उन्होंने हिंदी कथा लेखन की परिपाटी पूरी तरह बदल डाली थी। अपनी रचनाओं में उन्होंने उन लोगों को प्रमुख पात्र बनाकर साहित्य में स्थान दिया जिन्हें जीवन और जगत में केवल प्रताड़ना व लाइन ही मिले मे 8 अक्तूबर 1936 में उनका देहान्त हुआ। प्रेमचंद ने जितनी भी कहानियाँ लिखों से सब मानसरोवर शीर्षक से आठ भागों म...

रवींद्रनाथ ठाकुर (1861-1941)

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रवींद्रनाथ ठाकुर (1861-1941)   बंगाल के एक संपन्न परिवार में 6 मई 1861 को जन्मे नाथ ठाकुर नबिल पुरस्कार पाने वाले पहले भारतीय हैं। इनकी शिक्षा-दीक्षा पर पर ही हुई छोटी उम्र में ही स्वाध्याय से कई विषयों का ज्ञान प्राप्त कर लिया। वकालत पढ़ने के लिए विदेश भेजे गए, परंतु बिना परीक्षा दिए हो लौट आए। खोडनाथ की रचनाओं में लोक-संस्कृति का स्वर मुख्य रूप से मुखरित होता है। प्रकृति से इन्हें लगाव था। इन्होंने लगभग एक हतार कविताएँ और दो हजार गीत लिखे है। संगीत तथा भाव के प्रति इनके खास अनुराग के कारण रवींद्र संगीत नाम की एक अलग धारा का हो सूत्रपात हो गया। इन्होंन शांति निकेतन नाम की एक सैक्षिक और सांस्कृतिक संस्था की स्थापना की। यह अपनी तरह का अनोखा संस्थानमा जाता है। अपनी काव्य कृतिः गीतांजलि के लिए नाचत पुरस्कार से सम्मानित हुए स्वीदनाथ टाकुर की दूसरी प्रमुख कृतियाँ वैद्य, पूरवी, बलाका, क्षणिका, चित्र और सांध्यगीत, काबुलीवाला और सैकड़ों दूसरी कहानियाँ उपन्यास- गोरा घरे बारे तथा रवींद्र के निबंध

महादेवी वर्मा (1907-1987)

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महादेवी वर्मा (1907-1987) उत्तर प्रदेश के फर्रूखाबाद में 1907 की होली के दिन जन्मों महादेवी वर्मा को प्रारंभिक शिक्षा हुई। विवाह के बाद पड़ाई कुछ अंतराल से फिर शुरू की। में मिडिल में पूरे प्रांत में प्रथम तथा भी पाईं। यह सिलसिला को कक्षाओं तक चला। बौद्ध भिक्षुणी बनना चाहा परंतु महात्मा गांधी के आह्वान पर सामाजिक कार्यों में जुट गईं। उच्च शिक्षा के लिए विदेशा न जाकर नारी शिक्षा प्रसार में जुट गई। उन्होंन स्वतंत्रता आंदोलन में भी भाग लिया। महादेवी ने छायाताद के चार प्रमुख रचनाकारों में औरों से अलग अपना एक विशिष्ट स्थ महादेवों का समस्त काव्य वेदनामय है। इनकी कविता का स्वर सबसे अलग और खास तो था हो अपरिचित भी था। इन्होंने साहित्य को बेजोड़ गए रचनाओं से भी समृद्ध किया है। 11 सितंबर 1987 को उनका देहान्त हुआ। उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार सहित अवसरः सभी प्रतिष्टित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। भारत सरकार ने 1956 में उक्त पद्मभूषण अलंकरण से अलंकृत किया था। केवल आठ वर्ष की उम्र में बारहमासा जैसी बेजोड़ कवि लिखने वाली महादेवको मुख कृतियाँ - नीहार, रश्मि, दीपशिखा नीरजा, सांध्यगीत प्रथम आयाम, अग्निरे...

सुमित्रानंदन पंत (1900-1977)

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सुमित्रानंदन पंत (1900-1977) 20 मई 1900 को उत्तराखंड के कौसानी अलमोड़ा में जन्मे सुमित्रानंदन पंत ने बचपन से ही कविता) लिखना आरम्भ कर दिया था। सात साल की उम्र में स्कूल में काव्य पाठ के लिए पुरस्कृत हुए। 1915 में स्थायी रूप से साहित्य सृजन शुरू किया तथा छायावाद के प्रमुख स्तंभ के रूप में जाने गए। पंत जी की आरंभिक कविताओं में प्रकृति प्रेम और रहस्यवाद झलकता है। इसके बाद वे मार्क्स तथा महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित हुए। इनको बाद की कविताओं में अरविंद दर्शन का असर साफ नंतर आता है। जीविका के क्षेत्र में पंत जी उदयशंकर संस्कृति केंद्र से जुड़े आकाशवाणी के परामर्शदाता रहे। लोकायतन सांस्कृतिक संस्था की स्थापना की। 1961 में भारत सरकार ने इन्हें पद्मभूषण सम्मान से विभूषित किया। सुमित्रा नंदन पंत हिंदी के पहले ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता बने। पंत जी को कला और बूढ़ा चाँद कविता संग्रह पर 1960 में साहित्य अकादेमी पुरस्कार, 1969 में चिदंबरा संग्रह पर ज्ञानपीठ पुरस्कार सहित कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। उनका निधन 28 दिसंबर 1977 को हुआ। इनकी अन्य मुख्य कृतियाँ हैं वीणा, पल्लव, युगवाणी, ग्राम्...

मैथिलीशरण गुप्त (1886-1964)

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                                                           मैथिलीशरण गुप्त (1886-1964) 1886 में झाँसी के करीब विरगाँव में जन्मे मैथिलीशरण गुप्त अपने जीवनकाल में हो राष्ट्रकवि के रूप में प्रसिद्ध हुए। इनको शिक्षा-दीक्षा पर पर ही हुई। संस्कृत, बारला, मराठी तथा अग्रज पर इनका समान अधिकार थागुप्त जी रामभक्त कवि हैं। राम का कॉलिंगान इनको चिरसचित अभिलाषा रही। इन्होंने भारतीय जोवन को समग्रता में समझने तथा प्रस्तुत करने का भी प्रयास किया।गुप्त जी की कविता की भाषा विशुद्ध खड़ी बोली है। भाषा पर संस्कृत का असर है। काव्य को कथावस्तु भारतीय इतिहास के ऐसे अंशों से ली गई है जो भारत के अतीत का स्वर्ण चित्र पाठक के सामनव्यक्त करते हैं। गुप्त जी की प्रमुख कृतियाँ हैं माकत यशोधरा उपगुप्त जी के पिता सेठ रामचरण दास भी कवि थे तथा इनके छोटे भाई सियारामशरण गुप्त भी प्रसिद्ध                           ...

बिहारी (1595-1663)

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बिहारी (1595-1663) हिन्दी के प्रसिद्ध कवि बिहारी का जन्म 1595 में ग्वालियर में हुआ था। जब बिहारी जी की उम्र सात-आठ साल को हाथी तभी इनके पिता ओरछा चले आए जहाँ बिहारी जी ने आचार्य केशवदास से काव्य शिक्षा पाई। यहाँ बिहारी रहीम के संपर्क में आए। बिहारी ने अपने जीवन का कुछ समय जयपुर में भी बिताया। बिहारी रसिक जीव थे पर इनकी रसिकता नागरिक जीवन को रसिकता थी। उनका स्वभाव विनोदी तथा व्यंग्यप्रिय था। 1663 में इनका स्वर्गवास हुआ। बिहारी की एक ही रचना सतसैवाउपलब्ध है जिसमें उनके बनाए 700 दोहे संकलित हैं। लोक जान और शास्त्र ज्ञान के साथ ही बिहारी का काव्य ज्ञान भी अच्छा था। रीतिका उन्नत पूर्ण ज्ञान था। इन्होंने अधिक वयं सामग्री शृंगार में ली है। इनका काव्य शृंगार रस का है इसलिए नायक, नायिका या नायिकी दोहा जैसे छोटे से छंद में गहरी अर्थव्यंजना के कारण कहा जाता है कि बिहारी गागर में सागर भरने में माहिर थे। उनके दोहों के अर्थगांभीर्य को देखकर कहा जाता है- की वे चेष्टाएँ जिन्हें हाथ कहते हैं। इनमें काफी मात्रा में मिलती हैं। बिहारी की भाषा बहुत कुछ शुद्ध बज है लेकिन वह साहित्यिक इनकी भाषा में पूर्वी प्...

मीरा बाई (1503-1546)

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मीरा बाई (1503-1546) ऐसा माना जाता है कि सौराबाई का जन्म जोधपुर के चौकड़ी (फुडको) गाँव में 1503 में हुआ था। 13 वर्ष की छोटी सी आयु में संवाद के महाराणा सांगा के कुँवर भोजन से उनका विवाह हुआ। उनका दुखोंकी में ही बीता। बाल्यावस्था में हो माँ का देहांत हो गया था। विवाह के कुछ ही वर्ष बाद पहले पति उसके बाद पिता और फिर एक युद्ध के दौरान स्वसुर का भी देहांत हो गया। भौतिक जीवन से निगश मोरा ने घर-परिवार त्याग दिया तथा वृंदावन में डेरा डाल पूरी तरह गिरधर गोपाल कृष्ण के प्रति समर्पित हो गई। मध्यकालीन भक्ति आंदोलन को आध्यात्मिक प्रेरणा ने जिन कविया को जन्म दिया उनमें सौराबाई का सस्थान है। इनके पद पूरे उत्तर भारत सहित गुजरात, बिहार तथा बंगाल तक प्रचलित है। मोरा हिंदी व की मानी जाती हैं। संत रैदास को शिष्या मौरा की कुल सात-आठ कृतियाँ ही मुक्त है। मीरा की भक्ति तथा माधुर्यभान की है। इन पर बागियों सता और वैष्णव भक्तों का सम्मिलित प्रभाव पड़ा है। मीरा के परों को भाषा में राजस्थानी ब्रज तथा गुजराती का मिश्रण पाया जाता है। कहाँ पंजाबी खड़ी बोली और पू प्रयोग केभी मिल जाते हैं। पाठ प्रवेश कहते हैं पारिवारि...

कबीर (1398-1518)

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कबीर (1398-1518) कचौर का जन्म 1398 में काशी में हुआ माना जाता है। गुरु रामानंद के शिष्य कबीर ने 120 वर्ष के आयु पाईं। जीवन के अंतिम कुछ वर्ष मगहर में बिताए और वहीं परमगति को प्राप्त हुए। कबीर का आविर्भाव ऐसे समय में हुआ था जब राजनीतिक धार्मिक एवं सामाजिक कालियाँ अपने चरम पर थीं। कबीर क्रांतदशी कवि थे। उनकी कविता में गहरी सामाजिक चेतना प्रकट होती है। उनकी कविता सहज ही मर्म को छू लेती है। एक तरफ धर्म के बाह्याडंबरों पर उन्होंने गहरी व तीखी चोट की है तो दूसरी तरफ आत्मा परमात्मा के विरह-मिलन के भावपूर्ण गीत गाए हैं। कबीर शास्त्रीय ज्ञान की अपेक्षा अनुभव ज्ञान को ज्यादा महत्त्व देते थे। उनका विश्वास सत्संग में था और वे मानते थे कि ईश्वर एक है. वह निर्विकार है, अरूप है। कबीर की भाषा पूर्वी जनपद की भाषा थी। वैसे कबीर जी की भाषा को सक्कड़ी भी कहा जाता है क्योंकि इसमें अवधी, राजस्थानी भोजपुरी और पंजाबी भाषाओं का मिश्रण है उन्होंने जनचेतना तथा जनभावनाओं को अपने सबद और साखियों के द्वारा जन-जन तक पहुँचाया। के काव्य के लिए प्रयोग किया जाने वाले 'साखी' शब्द 'साक्षी' शब्द का ही तद्भव ...

कैफ़ी आज़मी (1919-2002

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                                                                                                     कैफ़ी आज़मी (1919-2002]                                                                      अतहर हुसैन रिजवी का जन्म 19 जनवरी 1919 को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले में मजमा गाँव में हुआ। प्रारंभिक जीवन बनारस और आजमगढ़ में व्यतीत करने के बाद वह 1940 के दशक में फिल्म नगरी मुंबई चली आई और यहाँ से वह अदब की दुनिया में आगे चलकर वे कैफी आजमी नाम से मशहूर हुए। कैफी आजमी की गिनती प्रगतिशील उर्दू कवियों को पहली पंक्ति में की जाती है। कैफी की कविताओं में एक तरफ सामाजिक और राजन...