कबीर (1398-1518)
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| कबीर (1398-1518) |
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उत्तर- (1) सुखी व दुखी सांसारिक दृष्टि से संसार के सभी लोग मुखी और कबीर दास दुखी है। संसार के लोग भोग थाओं में मस्त हैं और इसी को सुख समझ रहे हैं, लेकिन कबीर लोगों को यह समझा रहे हैं, जबकि भोग पदार्थों का सुख क्षणिक है और प्रभु का सुख स्थायी है।
(i) सोना व जागना – जिसको प्रभु का जान नहीं है, वह संसार के भोग पदार्थों में मस्त है, जो स्थान की तरह है। - इसलिए संसार की यह समझ ही सोना है। जो व्यक्ति प्रभु के जान से वास्तविक सुख को जान चुका है, एक-सा रहता है, वह जागा हुआ है। वास्तविक सुख को न जानना साना है और चारतविक सुख को जानना जागना है।
प्रश्न 5. अपने स्वभाव को निर्मल रखने के लिए कबीर ने क्या उपाय सुझाया है?
उत्तर- (i) कबीर का मत कबीर का कथन है कि अपनी निंदा करने वाले व्यक्ति को सदैव अपने पास रखना चाहिए। इससे बार-बार अपनी बुराई सुनने का अवसर मिलता है और हम बुराइयों को दूर करने का प्रयास करते हैं। ऐसा बार-बार होने से हमारी सभी बुराइयाँ मिट जाएँगी और हमारा
स्वभाव निर्मल को आएगा। (ii) कबीर का सुझाव इसके लिए कचीर का सुझाव है कि निंदक व्यक्ति के लिए अपने ही आँगन में रहने के लिए घर बना देना चाहिए। ताकि वह बार-बार हमारे सामने हमारी कमियों को गिनाता रहे और हम उन्हें दूर करते रहें।
प्रश्न 6. एक अपिर पीव का, पढ़ सु पंडित होड़', इस पंक्ति द्वारा कवि क्या कहना चाहता है?
उत्तर- (i) संसार का पढ़ना- कबीर दास कहते हैं कि पुस्तकों को पढ़ पढ़कर संसार के लोग मरते जा रहे हैं। संसार की इस पढ़ाई से यदि हृदय में प्रेम उत्पन्न नहीं होता है तो यह पढ़ाई बेकार है। जिसमें सच्चा प्रेम नहीं है, वह व्यक्ति
पॉडल नहीं है, चाहे वह कितना भी पढ़ा-लिखा क्यों न हो। (ii) पर्व सु पंडित होइ 'पीव' का अर्थ है परमेश्वर से प्रेम जिस व्यक्ति ने एक भी अक्षर प्रभु के प्रेम का पद लिया है वही व्यक्ति पंडित कहलाता है। असली पढ़ना प्रभु का ज्ञान प्राप्त करना और उससे प्रेम करना है। प्रभु का ज्ञान हो जाने पर मनुष्य के हृदय में सबके प्रति सच्चा प्रेम पैदा हो जाता है। इसलिए कवि यह संदेश देना चाहता है।
कि ईश्वर का ज्ञान प्राप्त करो और सबसे प्रेम करो।

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