अंतोन चेखव (1860-1904)
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| अंतोन चेखव |
हाथ में बदला, पुलिस इंटर पहने हुए बाजार के ची में करियों की ताराला एक सिपाही चला आ रहा था। चारों किसी आदमी का शान तक नहीं था। दुकानों के खुदवाने की तरह
की इस सृष्टिको उपासनाहों से ताक रहे थे। कोई तक उनके आस-पास नहीं दिख रहा था सहसा ओचुमेलीय के कानों में एक आवाज गूँगी" तू काटेगा तू होतान कहाँ का? आ छोकरो! इसे साए जाने इनदिनों काट मन है। इसको
किसी कुठे के काने की आवारा सुनाई दोसको दिशा में और या कि एक व्यापारी पियूगिन के गम में से एक कुचा तो गा के बल पर जा रहा है की कफ़ लगी कमीज और बिना बटन को बास्केट पहने हुए एक का था। गिरते पड़ते उसने कृों को पिछली दो से पकड़ लिया। फिर कुछ का किया और एक चीज दी। दुकानों में हुए चेहरे बाहर शौक और देखते ही देखते जैसे जमीन फालिएको भंग हो जाने जैसा कुछ दीख रहा है, सिपाही
दु मा। तभी एक
जिसके अनुसार-
इस हरामको आ उसी वक्त किसी कुत्ते के काने की आवास पर जब इंस्पेक्टर ने मुड़कर देखो एक चिि से एक तीन
ओचुमेली मुद्दा और भीड़ को तरफ चल दिया। उसने टीएम के धारण किए हुए उस आदमी रहा था। उसके देखा, जो अपना उठाए वहाँ मौजूद था तथा उपस्थित लोगों को अपनी आप चेहरे पर साफ लिखदान की औमें नहीं जीत की हमे इसको और इस मोड के बीचोबीच अपनी अगली पारेको मुँह और पीठ बताई फिल्ता, ऊपर से नीचे तक पिता पहा ।

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